नारी तू इतनी ज़िद्दी क्यों हैं ?
कितनी बार गिरती फिसलती है ,
ढलती है फिर उठ खड़ी हो जाती है |
कोई सोच, कोई सीमा तुझे रोक क्यों नहीं पाती है,
कोई ऐसी मंज़िल नहीं जहाँ तू पहुंच नहीं पाती है |
नारी तू इतनी ज़िद्दी क्यों है?
सारा बोझ अपने कन्धों पर लेके आगे बढ़ती जाती है ,
जितने पड़ाव आते , उनको पार कर जाती है |
सारा जग तुझे कभी प्रेरित करता तो कभी तिरस्कार ,
कोई टिपण्णी कोई खबर तुझे नहीं भटका पाती |
नारी तू इतनी ज़िद्दी क्यों है ?












